बाजरा की खेती
जलवायु एवं भूमि : संकर बाजरा के लिये बलुई दोमट मिट्टी वाला क्षेत्र जिसमें जल निकास की पूरी व्यवस्था बेहतर है l भारी मिट्टी तथा जल भराव वाले क्षेत्र में बाजरा न बायें। सिंचित बाजरा के लिये यथा सम्भव खेत समतल होना चाहिये।
उन्नत किस्में : आर सी बी 2, डब्ल्यू सी सी 75, एच एच बी 67, एच एच बी 60 (जोगिया रोग से मुक्त), राज 171, आर एच बी-30, आई सी एम एच-356, आर एच बी-90, आर एच-169, पूसा-93, आर एच बी-121 इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र से भी अनेक संकर किस्म उपलब्ध है l
खेत की तैयारी : भारी मिट्टी और खरपतवार से ग्रस्त खेतों में दो अच्छी जुताई की आवश्यकता होती हैं। बुवाई के 2-3 सप्ताह पहले मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को ध्यान में रखते हुये प्रति हैक्टर पांच टन गोबर की खाद डालें। जहां गोबर की खाद की व्यवस्था न हो सके वहां प्रति हैक्टर 10-15 किलोग्राम अतिरिक्त नत्रजन दें। पहली वर्षा होते ही एक अच्छी जुताई करके बुवाई करें। बेहतर अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
बीजोपचार : गून्दिया या चैंपा से फसल को बचाने हेतु बीज को नमक के 20 प्रतिशत घोल (एक किलोग्राम नमक एवं पांच लीटर पानी) में लगभग पांच मिनट तक डुबो कर हिलायें। तैरते हुए हल्के बीज व कचरे को जला दें। शेष बचे हुए बीजों को साफ पानी से धोकर अच्छी प्रकार छाया में सुखाने के बाद बुवाई के काम में लेवें।
1. अधिक उपज के लिए बुवाई से पूर्व एक ग्राम थायोयूरिया प्रति लीटर पानी के घोल में 5 घटें बीज को भिगोने के बाद छाया में 2-3 घंटे सुखाकर बुवाई करें।
2. क्षारीय एवं लवणीय मिट्टी में बोने से पहले बाजरा के बीज को 1 प्रतिशत सोडियम सल्फेट में 12 घन्टे तक भिगोकर साफ पानी से धोकर छायां में सुखाने के बाद बीज को कवकनाशी से उपचारित कर बोयें। ऐसा उपचारित बीज खारी मिट्टी में बोने से अंकुरण ज्यादा होगा।
3. उपरोक्त उपचार के बाद प्रति किलोग्राम बीज को 3 ग्राम थाइरम से उपचारित करें। बुवाई पूर्व बीजों को एजेक्टोबेक्टर एवं पी.एस.बी. कल्चर से उपचारित करना लाभदायक होता है।
बीज दर एवं बुवाई : सामान्यतः बाजरा का चार किलोग्राम प्रमाणित बीज प्रति हैक्टर बोयें। कतारों के बीच 40-45 सेन्टीमीटर की दूरी रखें। बुवाई पहली वर्षा के साथ अवश्य कर देवें। बुवाई का उपयुक्त समय जून मध्य से जुलाई के तृतीय सप्ताह तक है। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहां बाजरा की बुवाई जून के दूसरे पखवाड़े में करना उचित रहेगा। वर्षा न होने पर यदि समय पर बुवाई न हो सके तो जहां पानी पर्याप्त मात्रा में हो वहां बाजरा की नर्सरी तैयार कर पौध को जुलाई के अन्त तक खेत में रोप देना लाभदायक रहेगा। बीज 3 से 5 सेन्टीमीटर गहरा बोयें जिससे अंकुरण सफलता पूर्वक हो सके और साथ ही बीज का उर्वरक से सम्पर्क भी न हो। बुवाई के 15 से 20 दिन बाद पौधों की छंटाई कर पौधे से पौधे की दूरी 15 सेन्टीमीटर कर देनी चाहिये और जहां बीज न उगा हो वहां छांटे हुए पौधे रोप दें। अधिकतम उपज हेतु एक हैक्टर में पौधों की संख्या एक लाख 66 हजार तक (16-17 पौधे प्रतिवर्ग मीटर में ) रखना चाहिये।
खाद व उर्वरक : सिंचित क्षेत्रों अथवा जिन क्षेत्रों में वर्षा 600 मिलीमीटर या अधिक होती है वहां अधिकतम उपज के लिये 90 किलो नत्रजन एवं 30 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टर देवें। जहां वर्षा 600 मिलीमीटर से कम हो वहां 40 किलो नत्रजन तथा 20-30 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टर देना चाहिये। नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई से पहले कतारों में 10 सेन्टीमीटर गहरा ऊर कर दीजिये। बुवाई के 25 से 30 दिन बाद वर्षा वाले दिन नत्रजन की आधी मात्रा देनी चाहिए l उर्वरक की सही मात्रा की आवश्यकता जानने हेतु मिट्टी की जांच करावें। बुवाई के समय नत्रजन देना सम्भव न हो तो सिफारिश की गई नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 10 से 15 दिन पूर्व ऊर कर दे सकते हैं l जस्ते की कमी वाली, भूमि में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट बुवाई से पूर्व ऊर कर देवें।
सिंचाई : सिंचित फसल की आवश्यकतानुसार समय समय पर सिंचाई करते रहना चाहिये। पौधों में फुटान होते समय सिट्टे निकलते समय तथा दाना बनते समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिये। वर्षा की कमी की स्थिति में पौधे पीले पड़ने से पहले ही सिंचाई करें।
निराई – गुड़ाई : बुवाई के तीसरे चोथे सप्ताह तक खेत में निराई कर खरपतवार निकाल देवें। आवश्यकतानुसार दूसरी निराई गुड़ाई प्रथम निराई गुड़ाई के 15 दिन पश्चात करें। गुड़ाई करते समय ध्यान रखें कि पौधों की जड़े न कटें। निराई गुड़ाई करना सम्भव न हो तो बाजरा की शुद्ध फसल में खरपतवार नष्ट करने हेतु बुवाई के तुरन्त बाद प्रति हैक्टर आधा किलोग्राम एट्राजिन सक्रिय तत्व का पानी में घोल बना कर छिड़काव करें। छिड़काव के बाद भी निराई करके एक बार हाथ से खरपतवार अवश्य निकालें। जहां इंटर क्रोपिंग फसल हो वहां केवल निराई गुड़ाई करके खरपतवार निकालें।
फसल संरक्षण : बाजरा फसल के कीट एवं रोग निम्न प्रकार है l
कातरा : मिथाइल पैराथियाॅन 50 ई सी 750 मिली लीटर, या क्यूनाॅलफाॅस 25 ई सी 625 मिली लीटर, या क्लोरपायरीफाॅस 20 ई सी एक लीटर प्रति हैक्टर का में से किसी एक दवा का छिड़काव करें।
सफेद लट : कारबोफ्यूराॅन 3 प्रतिशत कण 12 किलोग्राम प्रति हैक्टर बोनी के समय काम में लेवें।
रूट बग : जहां रूट बग का प्रकोप प्रति वर्ष होता हो वहां प्रकोप दिखाई देते ही 25 किलोग्राम क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का प्रति हैक्टर की दर से भुरकाव करें।
ग्रेवीविल, चेफर बीटल, ब्लिस्टर बीटल एवं ईयर हैड बग : कीटों का प्रकोप दिखाई देते ही क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से भुरकें या फसल पर मोनोकोटोफास 36 एस.एल. का एक लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिड़कें। चेफर बीटल प्रकाश पर आकर्षित होती है अतः इसे प्रकाश पाश पर आकर्षित कर नष्ट करें।
जोगिया (ग्रीन ईयर) या हरित बाल रोग : रोग से बचाव हेतु बीज को बुवाई से पूर्व 6 ग्राम मेटालेक्सिल 35 एस डी प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें तथा खड़ी फसल में जहां भी जोगिया रोग दिखाई देवे या आशंका हो, वहां बुवाई के 21 दिन बाद मैन्कोजेब 2 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। चरी बाजरा की फसल में से रोगग्रस्त पौधों को निकाल कर नष्ट करें। मुख्य फसल की बुवाई के समय रोग ग्रस्त पौधे खेत में नहीं रहने चाहिये। रोगरोधी किस्में बोयें।
अरगट : फसल को बचाने हेतु सिट्टे निकलते समय डेढ़ से दो किलोग्राम मैन्कोजेब के तीन तीन दिन के अन्तर पर 2-3 छिड़काव करने से प्रकोप कम होगा। बाजरा के खेत और उसके आसपास अन्जन घास को निराई कर नष्ट करें क्योंकि बाजरा का यह रोग अन्जन घास द्वारा फैलता है। अगर चरी बाजरा बोया हुआ हो तो चरी बाजरा की कटाई करते रहें तथा उसमें सिट्टे नहीं आने देवें क्योंकि इससे आस पास की बाजरा की मुख्य फसल पर रोग तेजी से फैलता है। सिट्टे निकलते समय अरगट, काग्या एवं हरित बाल रोग का पता लगाने के लिये फसल का सावधानी से निरीक्षण करें। अरगट व हरित बाल रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट करें। अरगट रोग ब्लिस्टर बीटल या चेफर बीटल द्वारा भी फैलता है। सिट्टे आते समय इनकी रोकथाम हेतु कारबेरिल 5 प्रतिशत 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर भुरकें। बाजरा की बुवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में किये जाने पर अरगट के प्रकोप में स्वतः कमी होना पाया गया है।
रूखड़ी (स्ट्राईगा):- रूखड़ी के नियन्त्रण के लिये ढाई किलोग्राम 2, 4-डी सोडियम लवण 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर का छिड़काव बुवाई के 3-4 सप्ताह के बीच करें तथा इसी रसायन को सवा किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से 8-10 सप्ताह के अन्तराल पर दोहरायें।